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ऋषि मनु ने क्यों समाप्त कराई नियोग प्रथा? महाभारत काल के बाद बदली सामाजिक व्यवस्था

Journalist Today Network1 मिनट में पढ़ें

प्राचीन भारतीय समाज में “नियोग” एक धर्मसम्मत प्रथा मानी जाती थी, जिसके तहत संतान प्राप्ति के लिए विशेष परिस्थितियों में किसी अन्य योग्य पुरुष से संतान उत्पन्न की अनुमति दी जाती थी। Mahabharata में वर्णित कथाओं के अनुसार, धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म इसी व्यवस्था के तहत हुआ था। आगे चलकर पांडवों के जन्म से जुड़ी कथाएं भी नियोग की परंपरा से संबंधित मानी जाती हैं।

लेकिन महाभारत काल के बाद यह प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हो गई। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, Manu ने सामाजिक मर्यादा, वंश व्यवस्था और पारिवारिक संरचना को अधिक व्यवस्थित करने के उद्देश्य से नियोग प्रथा को हतोत्साहित किया। मनुस्मृति में विवाह, वंश और स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर सख्त नियम निर्धारित किए गए, जिनमें वैवाहिक निष्ठा और कुल परंपरा की शुद्धता पर विशेष जोर दिया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय के साथ समाज अधिक स्थिर और संरचित होता गया। राजसत्ता, संपत्ति के अधिकार और वंश परंपरा की स्पष्टता बनाए रखने के लिए एक पति-पत्नी आधारित पारिवारिक व्यवस्था को प्राथमिकता दी गई। नियोग जैसी व्यवस्था, जो विशेष परिस्थितियों में स्वीकार्य थी, बाद के सामाजिक मानकों के अनुरूप नहीं मानी गई।

हालांकि, इतिहासकार यह भी कहते हैं कि नियोग को उस समय की सामाजिक जरूरतों के संदर्भ में समझना चाहिए। बदलते सामाजिक, धार्मिक और कानूनी ढांचे के कारण यह प्रथा धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई।

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