इस शिव मंदिर में प्रकृति करती है 24 घंटे जलाभिषेक, सालभर नहीं रुकती जलधारा, सावन में उमड़ती है भक्तों की भीड़


हरिद्वार. हरिद्वार से शुरू होने वाली शारदीय कावड़ यात्रा में अब कुछ ही समय शेष रह गया है। देश के अलग-अलग राज्यों से लाखों शिव भक्त हरिद्वार पहुंचकर गंगाजल भरते हैं और उसे कंधों पर उठाकर अपने-अपने गंतव्य की ओर रवाना होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कावड़ यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि तलवार की धार पर चलने के समान मानी जाती है, क्योंकि इसमें नियमों का पालन बेहद आवश्यक होता है।
शिव महापुराण और स्कंद पुराण में कावड़ यात्रा से जुड़े नियमों का विस्तार से वर्णन मिलता है। इन्हीं ग्रंथों के अनुसार, कावड़ उठाने से पहले संकल्प लेना अनिवार्य बताया गया है। संकल्प के बिना की गई कावड़ यात्रा को पूर्ण फलदायी नहीं माना जाता। मान्यता है कि संकल्प के माध्यम से भक्त भगवान शिव के प्रति अपनी श्रद्धा, नियम और उद्देश्य स्पष्ट करता है।
धार्मिक विद्वानों के अनुसार, कावड़ यात्रा एक चलता-फिरता मंदिर होती है। इसलिए यात्रा के दौरान शुद्धता, संयम और अनुशासन का विशेष ध्यान रखा जाता है। कावड़ को जमीन पर रखना, अपवित्र स्थानों पर जाना, नशा करना, झूठ बोलना या किसी का अपमान करना वर्जित माना गया है। नियमों का उल्लंघन करने पर पुण्य के बजाय पाप का भागीदार बनने की चेतावनी शास्त्रों में दी गई है।
शारदीय कावड़ यात्रा की शुरुआत फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से मानी जाती है। इस दौरान नियमपूर्वक गंगाजल लाकर शिवलिंग पर अभिषेक करने से भक्त की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।







