इस शिव मंदिर में प्रकृति करती है 24 घंटे जलाभिषेक, सालभर नहीं रुकती जलधारा, सावन में उमड़ती है भक्तों की भीड़


सनातन धर्म में शंकराचार्य पद को सर्वोच्च धार्मिक और आध्यात्मिक पद माना जाता है। शंकराचार्य केवल किसी मठ के प्रमुख नहीं होते, बल्कि वे वेद, उपनिषद, शास्त्र और अद्वैत वेदांत के संरक्षक भी माने जाते हैं। आम लोगों के मन में अक्सर सवाल उठता है कि शंकराचार्य कैसे बनते हैं – क्या यह चुनाव प्रक्रिया है या परंपरागत चयन?
8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने इस परंपरा की स्थापना की थी। तब से आज तक शंकराचार्य बनने की प्रक्रिया उन्हीं नियमों और परंपराओं के अनुसार होती है। देश में चार प्रमुख मठ हैं और हर मठ के प्रमुख को ही शंकराचार्य कहा जाता है। यह पद हिंदू धर्म में सर्वोच्च धर्म गुरु का माना जाता है, जैसे बौद्ध धर्म में दलाई लामा और ईसाई धर्म में पोप।
हाल ही में प्रयागराज माघ मेला 2026 में मौनी अमावस्या के अवसर पर, मेला प्रशासन और ज्योतिषपीठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच विवाद शुरू हो गया। प्रशासन ने उन्हें नोटिस भेजा कि शंकराचार्य का नाम अपने साथ कैसे जोड़ सकते हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके आधिकारिक शंकराचार्य होने पर रोक लगाई हुई है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि शंकराचार्य बनने के लिए गहन विद्वत्ता, साधना और मठ की परंपरा का पालन आवश्यक है। यह पद केवल आध्यात्मिक ज्ञान और अनुशासन के आधार पर ही दिया जाता है। इस विवाद ने पुनः इस परंपरा और शंकराचार्य बनने की प्रक्रिया पर ध्यान आकर्षित किया है।







