इस शिव मंदिर में प्रकृति करती है 24 घंटे जलाभिषेक, सालभर नहीं रुकती जलधारा, सावन में उमड़ती है भक्तों की भीड़


मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को धर्म, सत्य और आदर्श जीवन का प्रतीक माना जाता है। उनका चरित्र जितना महान था, उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका उनके गुरुओं की भी रही, जिन्होंने बचपन से लेकर युवावस्था तक उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान राम ने अनेक ऋषि-मुनियों से ज्ञान प्राप्त किया, लेकिन उनके जीवन में दो प्रमुख गुरु माने जाते हैं—महर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र।
भगवान राम के पहले और प्रमुख गुरु थे महर्षि वशिष्ठ, जो अयोध्या के रघुवंश के कुलगुरु थे। राजा दशरथ के चारों पुत्रों—राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न—का नामकरण संस्कार और प्रारंभिक शिक्षा वशिष्ठ जी के आश्रम में ही हुई थी। महर्षि वशिष्ठ ने श्री राम को वेद, उपनिषद, नीति, राजधर्म और आत्मज्ञान की शिक्षा दी। उन्हीं की शिक्षाओं से भगवान राम के भीतर संयम, करुणा और धर्मनिष्ठा के गुण विकसित हुए।
वहीं, भगवान राम के जीवन में दूसरा महत्वपूर्ण स्थान महर्षि विश्वामित्र का है। विश्वामित्र जी ने राम और लक्ष्मण को अपने साथ यज्ञ की रक्षा के लिए ले जाकर उन्हें दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान दिया। उन्हीं के मार्गदर्शन में भगवान राम ने ताड़का, सुबाहु और मारीच जैसे राक्षसों का वध किया। साथ ही, सीता स्वयंवर में शिव धनुष भंग करने का सामर्थ्य भी विश्वामित्र जी से प्राप्त शिक्षा का ही परिणाम था।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दोनों गुरुओं ने भगवान राम को न केवल शास्त्र और शस्त्र का ज्ञान दिया, बल्कि उन्हें एक आदर्श मानव और राजा बनने की राह भी दिखाई। यही कारण है कि आज भी श्री राम का जीवन गुरु-शिष्य परंपरा का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है।







