इस शिव मंदिर में प्रकृति करती है 24 घंटे जलाभिषेक, सालभर नहीं रुकती जलधारा, सावन में उमड़ती है भक्तों की भीड़


महाभारत के युद्ध से पहले पांडव मानसिक रूप से बहुत टूट चुके थे।
अपनों से ही युद्ध, अपने ही कुल का रक्त बहाना —
यह सोचकर अर्जुन और उनके भाई भीतर से कांप रहे थे।
तभी शरशय्या पर पड़े भीष्म पितामह ने उन्हें एक अमूल्य जीवन-सूत्र दिया।
उन्होंने कहा —
“दुखों का आना-जाना जीवन का स्वभाव है।
जो दुख से भागता है, वह भीतर से कमजोर हो जाता है।
और जो अपने आंसुओं को दबा लेता है,
उसका मन कभी हल्का नहीं हो पाता।”
भीष्म ने आगे कहा —
“जब मन भारी हो, तो रो लेना कोई कमजोरी नहीं है।
आंसू आत्मा की सफाई हैं।
वे भीतर जमा दर्द को बाहर निकाल देते हैं।
और जब मन हल्का होता है, तभी बुद्धि सही निर्णय ले पाती है।”
पांडवों ने यह समझा कि
अपने दुख को स्वीकार करना ही असली वीरता है।
क्योंकि जो अपने भावनाओं से भागता नहीं,
वही जीवन की कठिन लड़ाइयों को जीत पाता है।
दुख आना गलत नहीं
रोना कमजोरी नहीं
भावनाएं दबाना आत्मा को बीमार करना है
मन हल्का होगा तो विवेक जागेगा
हम आज भी अक्सर कहते हैं —
“मजबूत बनो, रोना मत।”
लेकिन सच्चाई यह है —
जो रोकर खुद को संभाल ले,
वही सच में मजबूत होता है।
जब मन बोझिल लगे,
तो आंसुओं को बहने दें…
वे आपको फिर से खड़ा होने की ताकत देंगे







