इस शिव मंदिर में प्रकृति करती है 24 घंटे जलाभिषेक, सालभर नहीं रुकती जलधारा, सावन में उमड़ती है भक्तों की भीड़


उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित भगवान वराह का प्राचीन मंदिर आस्था, पौराणिक मान्यताओं और सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है. यह मंदिर भगवान विष्णु के तीसरे अवतार वराह अवतार को समर्पित है, जिनका संबंध धरती के उद्धार से जुड़ी एक अत्यंत चौंकाने वाली कथा से है.
मंदिर के महंत अजय कुमार मिश्रा बताते हैं कि पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, एक समय हिरण्याक्ष नामक राक्षस ने पृथ्वी को पाताल लोक में छिपा दिया था. इससे सृष्टि में भारी संकट उत्पन्न हो गया. तब भगवान विष्णु ने वराह का रूप धारण किया और पाताल लोक में जाकर राक्षस का वध किया. इसके बाद उन्होंने अपनी विशाल दंतों पर धरती को उठाकर पुनः ब्रह्मांड में स्थापित किया.
इसी दिव्य घटना की स्मृति में इस स्थान पर भगवान वराह की पूजा-अर्चना की परंपरा प्रारंभ हुई, जो आज भी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जाती है. माना जाता है कि यह मंदिर कई सौ वर्षों पुराना है और यहां दर्शन करने से भय, संकट और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है.
स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले भक्त यहां भगवान वराह से सुख-समृद्धि और जीवन की स्थिरता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. खास अवसरों और धार्मिक पर्वों पर मंदिर में विशेष पूजा और अनुष्ठान भी किए जाते हैं. गोंडा का यह प्राचीन वराह मंदिर आज भी सनातन संस्कृति और पौराणिक इतिहास की जीवंत गाथा सुनाता है.







