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मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई छांड़ी दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई चुनरी के किये टूक…
पायो जी मैने राम रतन धन पायो वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो जनम जनम की पूंजी पाई, जग में सभी खोवायो खरचे ना खूटे, चोर न लूटे, दिन-दिन बढ़त सवायो सत की नाव खेवटिया…