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धर्म

अहोई अष्टमी: संतान की दीर्घायु और खुशहाली के लिए रखा जाता है निर्जला व्रत; जानें साहुकारनी और स्याहू माता की पौराणिक कथा

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धर्म डेस्क | नई दिल्ली कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को माताओं द्वारा संतान की लंबी आयु, आरोग्य और सुख-समृद्धि के लिए अहोई अष्टमी का पावन निर्जला व्रत रखा जाता है। दिनभर उपवास के बाद शाम को तारों को अर्घ्य देकर और अहोई माता की पौराणिक कथा सुनकर ही व्रत का पारण किया जाता है।

अहोई अष्टमी की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में एक साहूकार के सात बेटे और सात बहुएं थीं। दीपावली के पर्व की तैयारियों के तहत घर की लीपा-पोती के लिए सातों बहुएं अपनी इकलौती ननद के साथ जंगल में पीली मिट्टी खोदने गईं।

  • अनजाने में हुआ अपराध: जिस स्थान पर मिट्टी खोदी जा रही थी, वहीं पास में स्याहू की मांद थी। खुरपी चलाते समय ननद के हाथों अनजाने में स्याहू का एक बच्चा कटकर मर गया।

  • स्याहू का शाप: अपने बच्चे की मृत्यु से क्रोधित होकर स्याहू माता ने शाप दिया कि वह मिट्टी खोदने वाली की कोख बांध देंगी, जिससे उसे कभी संतान का सुख नहीं मिलेगा।

  • ननद की रक्षा और छोटी बहू का त्याग: ननद के अनुनय-विनय पर बाकी छह बहुओं ने तो मना कर दिया, लेकिन छोटी बहू ने परिवार की शांति के लिए ननद के बदले अपनी कोख बंधवा ली। इसके बाद छोटी बहू को जो भी बच्चा होता, वह ठीक सातवें दिन प्राण त्याग देता।

सुरही गाय और गरुड़ पंखनी की कृपा

लगातार संतानों की मृत्यु से दुखी छोटी बहू ने एक पंडित जी की सलाह पर स्याहू माता की परम सहेली सुरही गाय की सेवा शुरू की। वह प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में तबेले की निस्वार्थ सफाई करती।

  1. सुरही गाय का साथ: छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर सुरही गाय उसे समुद्र पार स्याहू माता के पास ले जाने के लिए तैयार हुई।

  2. सद्कर्म का फल: मार्ग में एक वृक्ष के नीचे विश्राम करते समय छोटी बहू ने गरुड़ पंखनी के बच्चे को सांप के डसने से बचाया। प्रसन्न होकर गरुड़ पंखनी ने दोनों को तुरंत स्याहू माता के द्वार तक पहुंचा दिया।

स्याहू माता का आशीर्वाद और कोख की मुक्ति

स्याहू माता के घर पहुंचकर छोटी बहू ने बड़ी श्रद्धा से उनके सिर की जुएं साफ कर उन्हें शीतलता पहुंचाई। इससे प्रसन्न होकर स्याहू माता ने अनजाने में आशीर्वाद दे दिया—"जा, तेरे घर सात बेटे और सात बहुएं होंगी।"

जब छोटी बहू ने अपनी बंध चुकी कोख की सच्चाई बताई, तो स्याहू माता ने कहा कि वचन वापस नहीं हो सकता। उन्होंने प्रसन्न होकर छोटी बहू को विधि-विधान से उजमण (उद्यापन) करने, दीवार पर सात अहोई माता मांडने और सात कड़ाही चढ़ाने का निर्देश देकर विदा किया।

घर लौटने पर छोटी बहू को सात पुत्रों और बहुओं का सुख प्राप्त हुआ। जिस प्रकार अहोई माता ने साहूकार की छोटी बहू की कोख को मुक्त कर संतानों की रक्षा की, उसी प्रकार यह पावन कथा पढ़ने और सुनने वाली सभी माताओं की संतानों पर अहोई माता का आशीष बना रहता है।

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योगराज शर्मा

संपादक, आज की दिल्ली

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