
तारिक रहमान की भारत यात्रा पर संशय: 30 साल पुरानी गंगा जल संधि टूटने का खतरा, कूटनीतिक हलचल तेज
विशेष संवाददाता | नई दिल्ली भारत और बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंधों में एक बार फिर कूटनीतिक जटिलताएं बढ़ती नजर आ रही हैं। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की प्रस्तावित भारत यात्रा लगातार टलने से 30 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक ‘गंगा जल बंटवारा संधि’ (Ganga Water Treaty) के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है। जानकारों के मुताबिक, यदि दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच समय रहते द्विपक्षीय वार्ता नहीं हुई, तो वर्ष 1996 में हुआ यह महत्वपूर्ण समझौता खटाई में पड़ सकता है।
क्या है पूरा विवाद?
30 साल की समय-सीमा: 12 दिसंबर 1996 को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा और बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच 30 वर्षों के लिए गंगा जल बंटवारा संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे।
नवीनीकरण की अनिवार्यता: यह संधि वर्ष 2026 में अपनी 30 साल की अवधि पूरी कर रही है। इसके प्रभावी बने रहने के लिए दोनों देशों के बीच समय पर उच्च स्तरीय वार्ता और आधिकारिक नवीनीकरण अनिवार्य है।
फरक्का बैराज से जल नियंत्रण: यह संधि प्रतिवर्ष 1 जनवरी से 31 मई के शुष्क मौसम में गंगा नदी के जल बंटवारे को नियंत्रित करती है, जो पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद स्थित फरक्का बैराज से संचालित होता है।
यात्रा में क्यों आ रही हैं अड़चनें?
चार बार टल चुकी है यात्रा: तारिक रहमान की भारत यात्रा अब तक चार बार स्थगित हो चुकी है। पूर्व में अगस्त के अंत में उनकी पहली आधिकारिक यात्रा प्रस्तावित थी, लेकिन औपचारिक कार्यक्रमों और दोनों पक्षों के कूटनीतिक तनाव के कारण यह संभव नहीं हो सकी।
ढाका की घरेलू राजनीति: बांग्लादेश में कट्टरपंथी तत्वों और जमात-ए-इस्लामी द्वारा लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव को हवा दी जा रही है। ढाका के सत्ता तंत्र के कुछ वर्गों की बयानबाजी के कारण रहमान सरकार पर भारत के साथ बातचीत में अत्यधिक सतर्कता बरतने का आंतरिक दबाव है।
शर्तों का पेंच: ढाका की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण और भारतीय जमीन से अवामी लीग की राजनीतिक गतिविधियों पर रोक जैसी शर्तें उठाई जाती रही हैं, जिस पर भारत ने दो टूक स्पष्ट किया है कि जल्दबाजी में ऐसी मांगें स्वीकार्य नहीं हैं।
जल संधि टूटी तो क्या होगा असर?
"गंगा जल संधि के तहत 11 मार्च से 10 मई के बीच दोनों देशों को बारी-बारी से 35,000 क्यूसेक तक न्यूनतम गारंटीयुक्त पानी मिलने का प्रावधान है। यदि समय रहते नई सहमति नहीं बनी, तो बांग्लादेश के दक्षिण-पश्चिमी कृषि क्षेत्रों में जल संकट गहरा सकता है और दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट और बढ़ सकती है।"
कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश के अपने जल हितों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए नई दिल्ली के साथ सीधा संवाद स्थापित करना ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प है।
संपादक, आज की दिल्ली
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