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त्योहारों पर अतिक्रमणकारियों के आगे बेबस क्यों नजर आते हैं पुलिस और एमसीडी के अधिकारी?

योगराज शर्मा3 मिनट में पढ़ें

सड़कों और फुटपाथों पर कब्जे से पैदल चलने वालों की परेशानी बढ़ी, बाजारों में ट्रैफिक जाम बना बड़ी समस्या; कार्रवाई के बजाय आंखें मूंदने पर उठ रहे सवाल

रोहिणी/नई दिल्ली। त्योहारों का मौसम आते ही दिल्ली के बाजारों में खरीदारी करने वालों की भीड़ बढ़ जाती है। लेकिन इसी के साथ सड़कों और फुटपाथों पर अवैध कब्जों की समस्या भी गंभीर रूप ले लेती है। दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों द्वारा फुटपाथों तथा सड़क के हिस्सों पर सामान फैलाने और अस्थायी दुकानें लगाने से पैदल चलने वालों के लिए रास्ता तक नहीं बचता। नतीजा यह होता है कि लोगों को मजबूरन सड़क पर चलना पड़ता है और वाहनों की आवाजाही भी प्रभावित होती है।

रोहिणी के विभिन्न सेक्टरों के बाजारों से लेकर दिल्ली के दूसरे प्रमुख बाजारों तक कमोबेश यही स्थिति देखने को मिलती है। त्योहारों के दौरान बाजारों में भीड़ के साथ अतिक्रमण बढ़ने से जाम, अव्यवस्था और दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है।

त्योहार आते ही नियम-कानून क्यों हो जाते हैं कमजोर?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सामान्य दिनों में अतिक्रमण हटाने के लिए पुलिस और नगर निगम की ओर से अभियान चलाए जाते हैं, तो त्योहारों के दौरान यही विभाग नरम क्यों पड़ जाते हैं? क्या अधिकारियों को सड़क और फुटपाथ पर कब्जे दिखाई नहीं देते, या फिर जानबूझकर अनदेखी की जाती है?

स्थानीय नागरिकों के बीच यह सवाल भी चर्चा का विषय है कि कहीं कार्रवाई नहीं होने के पीछे किसी तरह का आर्थिक लेन-देन तो नहीं है? हालांकि, इस तरह के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन प्रशासन की निष्क्रियता पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल जरूर खड़े करती है।

फुटपाथ जनता के लिए या अतिक्रमणकारियों के लिए?

त्योहारों के दौरान दिल्ली के बाजारों में अतिक्रमण और यातायात की समस्या को लेकर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। आखिर पुलिस और एमसीडी के अधिकारी स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाल पा रहे हैं?

स्थानीय लोगों का कहना है कि फुटपाथों पर कब्जे के कारण बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांगों को सबसे अधिक परेशानी होती है। कई जगह दुकानों का सामान सड़क तक फैला रहता है, वहीं रेहड़ी-पटरी और अवैध पार्किंग के कारण सड़कें संकरी हो जाती हैं। इससे वाहन चालकों को जाम में फंसना पड़ता है और पैदल चलने वालों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ती है।

चांदी का जूता या प्रशासनिक लापरवाही?

नागरिकों के बीच यह सवाल भी उठता है कि क्या अतिक्रमण करने वालों को किसी तरह का संरक्षण मिल रहा है? कहीं कथित लेन-देन के कारण तो कार्रवाई नहीं रोकी जाती? इन आशंकाओं की जांच जरूरी है। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की मिलीभगत सामने आती है तो उसके खिलाफ भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।

अभियान होते हैं, लेकिन स्थायी समाधान कहां?

दिल्ली में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई पहले भी होती रही है। जून 2026 में दिल्ली पुलिस और एमसीडी ने संयुक्त अभियान चलाकर 1,264 रेहड़ी-पटरी अतिक्रमण और 1,015 अन्य अवैध ढांचे हटाए थे। वहीं 28 अक्टूबर 2026 को मध्य दिल्ली में विशेष अभियान के दौरान 64 रेहड़ियां हटाई गईं और 121 चालान किए गए।

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इसके बावजूद बाजारों में अतिक्रमण की समस्या बार-बार सामने आना अभियान की निरंतरता और प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है।

जनता की मांग: फुटपाथ खाली हों, सड़कें अतिक्रमण मुक्त हों

रोहिणी सहित दिल्ली के सभी प्रमुख बाजारों में नियमित निगरानी, निष्पक्ष कार्रवाई और निर्धारित वेंडिंग जोन की व्यवस्था की जरूरत है। पुलिस और एमसीडी को आपसी समन्वय से संयुक्त अभियान चलाना चाहिए। कार्रवाई केवल त्योहारों तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे वर्ष जारी रहनी चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए बनाए गए हैं, तो उन पर कब्जा करने वालों को रोकने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? क्या दिल्ली की जनता को सुरक्षित सड़क और खाली फुटपाथ पाने के लिए भी किसी अभियान का इंतजार करना पड़ेगा?

योगराज शर्मा

संपादक, आज की दिल्ली

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