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आईटीआर भरने में देरी और नोटिस के बाद रिटर्न दाखिल करना नहीं है 'आय छिपाना'; ITAT ने रद्द किया करीब 4 लाख रुपये का जुर्माना

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बिजनेस डेस्क | नई दिल्ली समय पर इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) न भरना और आयकर विभाग के नोटिस के बाद रिटर्न दाखिल करना करदाताओं को भारी पड़ सकता है, लेकिन आयकर अपीलीय ट्रिब्यूनल (ITAT) के एक हालिया फैसले ने टैक्सपेयर्स को बड़ी राहत दी है। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया है कि केवल देरी से ITR दाखिल करने या नोटिस मिलने पर रिटर्न भरने मात्र से यह साबित नहीं होता कि करदाता ने अपनी आय छिपाई थी (Under-reporting or Misreporting)। इस व्यवस्था के तहत ITAT ने करदाता पर लगाया गया लगभग 4 लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना पूरी तरह रद्द कर दिया है।


पूरा मामला क्या था?

  • निर्धारित समय पर ITR न भरना: एक करदाता ने तय समयसीमा (Section 139(1)) के भीतर अपना इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल नहीं किया था।

  • विभाग की नजर और नोटिस: बाद में आयकर विभाग को करदाता द्वारा बड़ी प्रॉपर्टी खरीदने, वेतन और ब्याज से आय होने की जानकारी मिली। इसके आधार पर विभाग ने पुराने मामले को दोबारा खोलते हुए नोटिस जारी किया।

  • रिटर्न दाखिल करना और स्पष्टीकरण: नोटिस मिलने के बाद करदाता ने अपनी कुल आय (लगभग 12.9 लाख से 31.6 लाख रुपये तक के विभिन्न मामलों में) घोषित कर दी। साथ ही, प्रॉपर्टी खरीदने के लिए होम लोन और निवेश बेचने जैसे पुख्ता वित्तीय प्रमाण भी पेश किए। सबसे अहम बात यह थी कि वेतन पर पहले ही टीडीएस (TDS) कट चुका था और विभाग ने करदाता की ओर से बताई गई आय को स्वीकार भी कर लिया था—यानी आय में कोई अतिरिक्त राशि नहीं जोड़ी गई थी।

इनकम टैक्स विभाग की कार्रवाई और जुर्माना

आयकर अधिकारी का मानना था कि यदि विभाग की ओर से नोटिस जारी न किया जाता, तो शायद यह आय सामने नहीं आती। इसे आधार बनाते हुए विभाग ने इनकम टैक्स कानून की धारा 270A के तहत 'आय कम बताने' (Under-reporting) का मामला माना और करीब 4 लाख रुपये (या टैक्स देनदारी का भारी हिस्सा) का जुर्माना ठोक दिया। करदाता की अपील पहली अपीलीय अथॉरिटी ने भी खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला ITAT की बेंच में पहुंचा।


ITAT का फैसला और मुख्य आधार

ट्रिब्यूनल ने मामले की सुनवाई करते हुए करदाता के पक्ष में फैसला सुनाया और जुर्माना रद्द करते हुए निम्नलिखित तर्क दिए:


  1. आय न छिपाना: चूंकि करदाता द्वारा घोषित की गई आय को आयकर विभाग ने स्वीकार कर लिया था और उसमें कोई नया अतिरिक्त छिपा हुआ स्रोत नहीं पकड़ा गया था, इसलिए इसे 'आय छिपाना' या 'अंडर-रिपोर्टिंग' नहीं कहा जा सकता।

  2. नोटिस पर रिटर्न भरना अपराध नहीं: केवल इस आधार पर जुर्माना नहीं लगाया जा सकता कि करदाता ने नोटिस मिलने के बाद अपना रिटर्न दाखिल किया है, जबकि उसने अपने सभी पैसों के वैध स्रोत (जैसे होम लोन और निवेश) पहले ही स्पष्ट कर दिए थे।

  3. कानूनी प्रक्रिया की खामी: ट्रिब्यूनल ने माना कि कानूनी प्रावधानों के तहत हर देरी या नोटिस पर सीधे भारी जुर्माना नहीं थोपा जा सकता जब तक कि स्पष्ट रूप से दुर्भावना या कर चोरी साबित न हो।

करदाताओं के लिए सीख

यह फैसला उन सभी लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है जो किन्हीं कारणों से तय समय पर ITR नहीं भर पाते और बाद में नोटिस मिलने पर अपना हिसाब साफ करते हैं। हालांकि यह आदेश कानूनी और तकनीकी बारीकियों पर आधारित है, फिर भी विशेषज्ञों की सलाह है कि संभावित पेनल्टी और कानूनी झंझटों से बचने के लिए हमेशा समय पर ही अपना इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करना चाहिए।

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योगराज शर्मा

संपादक, आज की दिल्ली

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