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समय पर कब्जा न देना पड़ा भारी; उपभोक्ता आयोग का सख्त फैसला, 50 लाख के फ्लैट के बदले डेवलपर को चुकाने होंगे 86 लाख रुपये

योगराज शर्मा3 मिनट में पढ़ें

रियल एस्टेट डेस्क | नई दिल्ली घर खरीदारों के लिए समय पर फ्लैट का पजेशन (कब्जा) न मिलना एक बहुत बड़ी और आम समस्या बन चुका है। इसी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला मुंबई के पनवेल इलाके से सामने आया है, जहां जिला उपभोक्ता आयोग ने तय समय पर फ्लैट का कब्जा न देने वाले एक डेवलपर को तगड़ा झटका दिया है। आयोग ने डेवलपर को आदेश दिया है कि वह खरीदार की मूल राशि पर 9% सालाना ब्याज जोड़कर कुल 86.37 लाख रुपये वापस करे। इसके अलावा मानसिक परेशानी और मुकदमेबाजी के खर्च के लिए 75,000 रुपये अलग से देने का निर्देश दिया गया है।

पूरा मामला क्या है?

  • बुकिंग और एग्रीमेंट: मुलुंड के रहने वाले तपन विसारिया ने अगस्त 2015 में महाराष्ट्र के पनवेल (आष्टे गांव) स्थित 'साउंड डिलाइट हाउसिंग प्रोजेक्ट' के डी-विग में 876 वर्ग फुट कारपेट एरिया वाला फ्लैट बुक किया था। फ्लैट की कुल कीमत 50.52 लाख रुपये तय हुई थी।

  • तय डेडलाइन: एग्रीमेंट के नियमों के मुताबिक, बिल्डर को 31 दिसंबर 2016 तक फ्लैट का कब्जा सौंपना था। लेकिन तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ और बिल्डर बार-बार प्रोजेक्ट पूरा होने की तारीख आगे बढ़ाता रहा। बाद में महा-रेरा (MahaRERA) की वेबसाइट पर इसकी नई डेडलाइन बढ़ाकर 30 सितंबर 2026 तक दिखा दी गई।

  • खरीदार का भुगतान और शिकायतें: खरीदार ने समय पर लगभग 45.45 लाख रुपये (फ्लैट की कीमत के अलावा टैक्स, स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस) का भुगतान कर दिया था। इसके बावजूद निर्माण की बेहद धीमी रफ्तार, बार-बार अतिरिक्त पैसों की मांग और ब्रोशर में वादा की गई सुविधाओं (जैसे क्लब हाउस, एम्फीथिएटर और बच्चों के खेलने की जगह) को बाद में रद्द किए जाने से परेशान होकर खरीदार ने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

उपभोक्ता आयोग का फैसला और निर्देश

मामلات की सुनवाई के बाद जिला उपभोक्ता आयोग ने स्पष्ट रूप से माना कि बिल्डर द्वारा तय समय पर फ्लैट का कब्जा न देना 'सेवा में गंभीर कमी' (Deficiency in Service) है। आयोग ने कहा कि किसी भी घर खरीदार को फ्लैट के लिए अनिश्चितकाल तक इंतजार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

  1. मूल राशि और ब्याज: आयोग ने बिल्डर को निर्देश दिया कि वह खरीदार से लिए गए 45,45,268 रुपये को 31 दिसंबर 2016 से लेकर पूरी राशि चुकाने तक 9% सालाना ब्याज के साथ वापस करे। ब्याज जुड़ने के बाद यह कुल राशि बढ़कर लगभग 86.37 लाख रुपये हो जाती है।

  2. मुआवजा व खर्च: खरीदार को मानसिक उत्पीड़न और मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में 75,000 रुपये अतिरिक्त देने का आदेश दिया गया।

  3. होम लोन के ब्याज पर फैसला: खरीदार ने बैंक से लिए गए होम लोन पर चुकाए गए ब्याज (लगभग 5.23 लाख रुपये) को भी वापस दिलाने की मांग की थी, जिसे आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले (GMADA बनाम अनुपम गर्ग मामला) का हवाला देते हुए खारिज कर दिया। आयोग का मानना था कि होम लोन खरीदार ने अपनी मर्जी से लिया था, इसलिए बिल्डर को उस कर्ज के ब्याज के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

घर खरीदारों के लिए जरूरी सबक

यह मामला देश के सभी होमबॉयर्स को यह सीख देता है कि केवल बिल्डर के लुभावने विज्ञापनों, ब्रोशर या मौखिक वादों पर आंख मूंदकर भरोसा न करें। प्रॉपर्टी खरीदते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखें:

  • एग्रीमेंट की शर्तें जांचें: एग्रीमेंट में पजेशन की निश्चित तारीख, भुगतान की समय-सीमा, देरी होने पर मिलने वाले हर्जाने (Penalty Clause) और बुकिंग रद्द करने के नियमों को अच्छी तरह पढ़ लें।

  • RERA स्टेटस चेक करें: संबंधित राज्य की रेरा (RERA) वेबसाइट पर जाकर प्रोजेक्ट का रजिस्ट्रेशन नंबर, अप्रूव्ड लेआउट मैप और निर्माण से जुड़ी वास्तविक प्रगति की नियमित जांच करते रहें।

  • दस्तावेज सुरक्षित रखें: बिल्डर के साथ किए गए पत्राचार, भुगतान की रसीदें, बैंक स्टेटमेंट और वादों से जुड़े सभी दस्तावेज हमेशा संभाल कर रखें ताकि विवाद की स्थिति में मजबूत कानूनी पक्ष रखा जा सके।

योगराज शर्मा

संपादक, आज की दिल्ली

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